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नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा राजधानी दिल्ली में अपराधों पर 2024 की जारी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष देवेन्द्र यादव ने कहा कि यह रिपोर्ट पर तो एक वर्ष पहले तक की है, जबकि आज राजधानी में अपराध के हालात कहीं गंभीर हो चुके है, रक्षक पुलिस भक्षक बनकर खुलेआम गोली मारकर हत्या कर रही है। बढ़ते अपराधों पर केन्द्रीय गृहमंत्री की निष्क्रियता और प्रभावहीन कार्यशैली के कारण संगीन अपराधों में देश के 19 महानगरों में राजधानी दिल्ली सबसे उपर है और वर्ष 2024 में यहां 2.70 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए, जबकि दिल्ली में अपराधिक आरोप पत्र दर्ज दाखिल करने की दर सबसे कम है। रिपोर्ट में राजधानी के महिलाओं के प्रति अपराधिक आंकडे़ दिल दहलाने वाले है जिनमें दहेज के लिए 109 मौते, बलात्कार के 1058 मामले, घरेलू क्रूरता के 4646 मामले अपहरण के 3974 मामले और यौन उत्पीड़न के 316 मामले दर्ज हुए। प्रति 1 लाख की जनसंख्या पर महिलाओं के खिलाफ अपराध की संख्या 176.8 रही। उन्होंने कहा कि दहेज के लिए हत्याओं को आंकड़ा 2023 में 114 और 2022 में 129 महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया।
पुलिस की गिरती साख का भी खुलासा किया है, कि दिल्ली पुलिस न्याय दिलाने में में कितनी निष्क्रिय है, जिस पर उच्च पुलिस अधिकारियों को संज्ञान लेने की आवश्यकता है। दिल्ली में प्रति लाख जनसंख्या पर संगीन अपराधों की दर 1688 है, जो देश के सभी महानगरों में सबसे अधिक है। राजधानी में 2024 में 2,75,402 संगीन अपराधिक मामले दर्ज किए गए, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में मामलों पर दिल्ली पुलिस सिर्फ 31.9 प्रतिशत के खिलाफ ही आरोप पत्र दाखिल किए, जो सभी महानगरों में सबसे कम है। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस अपराधियों के खिलाफ आरोप पत्र दर्ज ही नही करेगी, तो दिल्ली के लोगों को कैसे न्याय दिलाएगी। पुलिस की निरसता और लचीले या पक्षपात की नीति के कारण ही शायद दिल्ली में अपराधियों के हौसले बुलंद है और राजधानी अपराध में भी नम्बर वन बन चुकी है।
राजधानी में जहां हत्या, रेप, दहेज हत्या, महिलाओं के खिलाफ अपराध, लूट, आर्थिक अपराध, साईबर क्राईम, नशे का कारोबार जैसे अनेक अपराध वर्ष दर वर्ष बढ़ रहे है, वहीं आईपीसी और बीएनएस के तहत न्याय के लिए 2024 में 4,34,981 मामले लंबित थे। उन्होंने कहा कि एक वर्ष में अदालतों में केवल 50,305 मामलों का ट्रायल पूरा होने के बाद 88.3 प्रतिशत मामले अब भी अटके हुए है। ट्रायल पूरा हुए मामलों में अभियोजन की सफलता में सजा मिलने की दर 74.1 प्रतिशत दर्ज की गई जिसमें हत्या के मामलों में सजा 62.5 प्रतिशत। रेप के मामलों में सजा की दर 24.1 प्रतिशत और यौन उत्पीड़न के मामलों में चैकाने वाला है कि सजा किसी को नही दी गई, यह चिंताजनक है। आर्थिक् अपराधों के 25532 लंबित मामलों में सिर्फ 4524 मामलों की सुनवाई हुई जिनमें सजा दर 27.3 प्रतिशत दर्ज हुई और साईबर मामलों 1,152 मामलों में से सिर्फ 52 मामलों का ट्रायल हुआ।