नई दिल्ली 18, Sep 2026

लेख

1 - कैसे होंगे केरल के सियासी समीकरण

2 - कौन सा खेला खेलेंगी ममता बैनर्जी पश्चिम बंगाल में

3 - धर्मेंद्र हुए पंचतत्व में विलीन

4 - बिहार की जानता ने फिर एक बार साबित कर दिया कि हथेली में सरसों नहीं उगाया जा सकता

5 - जेट सिक्योरिटी के साथ विसर्जन के लिए निकला लाल बाग का राजा

6 - खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे

7 - एक पृथ्वी एक स्वास्थ्य के लिये योग

8 - ऑपरेशन सिंदूर न्याय की अखंड प्रतिज्ञा

9 - देश के लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए बाबा साहिब का अमूल्य योगदान

10 - दिल्ली सरकार के 100,000करोड़ से क्षेत्र में उन्नति की संभावनाओं को मिलेगी मजबूती

11 - दशक के बाद बिखरा झाड़ू 27 साल बाद खिला कमल फिर एक बार

12 - स्वर्णिम भारत,विरासत और इतिहास पर आधारित इस बार का गणतंत्र दिवस समारोह

13 - महाराष्ट्र में फिर एक बार लहराया बीजेपी का परचम

14 - तमाम कवायदों के बावजूद बीजेपी तीसरी बार हरियाणा में सरकार बनाने को अग्रसर

15 - श्रॉफ बिल्डिंग के सामने कुछ इस अंदाज से हुआ लाल बाग के राजा का स्वागत

16 - प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही शुरू हुआ बीजेपी का सदस्यता अभियान

17 - देश के सीमांत इलाकों में तैनात सैनिकों में भी दिखा 78 वें स्वतंत्रता दिवस का जज्बा

18 - २०२४-२५ के बजट को लेकर सियासत विपक्ष आमने सामने

19 - एक बार फिर तीसरी पारी खेलेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी

20 - केजरिवाल के जमानत पर रिहा होने पर शुरु हुई नई कवायदें

21 - मतदान की दर धीमी आखिर माजरा क्या

22 - क्यूं चलाना चाहते हैं केजरीवाल जेल से सरकार

23 - 2004-14 के मुकाबले 2014-23 में वामपंथी उग्रवाद-संबंधित हिंसा में 52 प्रतिशत और मृतकों की संख्या में 69 % कमी

24 - कर्तव्य पथ दिखी शौर्य की झलक

25 - फ़ाइनली राम लल्ला अपने आशियाने में हो गये हैं विराजमान

26 - राजस्थान का ऊँट किस छोर करवट लेगा

27 - एक बार फिर गणपति मय हुई माया नगरी मुंबई

28 - पत्रकारिता की आड़ में फर्जीवाड़े के खिलाफ एनयूजे(आई) छेड़ेगी राष्ट्रव्यापी मुहीम

29 - भ्रष्टाचार, तुस्टिकरण एवं परिवारवाद विकास के दुश्मन

30 - एक बार फिर शुरू हुई पश्चिम बंगाल में रक्त रंजित राजनीति

31 - नहीं होगा बीजेपी के लिऐ आसान कर्नाटक में कांग्रेस के चक्रव्यूह को भेद पाना

32 - रद्द करने के बाद भी नहीं खामोश कर पायेंगे मेरी जुबान

33 - उत्तर-पूर्वी राज्यों के अल्पसंख्यकों ने एक बार फिर बीजेपी पर जताया भरोसा

34 - 7 लाख तक की आमदनी टैक्स फ्री

35 - गुजरात में फिर एक बार लहराया बीजेपी का परचम

36 - बीजेपी आप में काँटे की टक्कर

37 - सीमित व्यवस्था के बावजूद धूम-धाम से हो रही है छट माइय्या की पूजा

38 - जहाँ आज भी पुजा जाता है रावण

39 - एक बार फिर माया नगरी हुई गणपतिमय

40 - एक बार फिर लहराया तिरंगा लाल किले की प्राचीर पर

41 - बलवाइयों एवं जिहादियों के प्रति पनपता सहनभूतिक रुख

42 - आजादी के अमृत महोत्सव की कड़ी के रूप में मनाया जा रहा है 8 वाँ विश्व योग दिवस

43 - अपने दिग्गज नेताओं को नहीं संभाल पाई कांग्रेस पार्टी

44 - ज्ञान व्यापी मस्जिद के वजु घर में शिवलिंग मिलने से विवाद गहराया

45 - आखिर क्यूँ मंजूर है इन्हे फिर से वही बंदिशें.....

46 - पाँच में से चार राज्यों में लहराया कमल का परचम

47 - पेट्रोलियम, फर्टिलाइजर एवं खाद्य सामाग्री पर मिलने वाली राहत में लगभग 27 फीसदी की कटौती

48 - जे&के पुलिस के सहायक उप निरीक्षक बाबूराम शर्मा मरणोपरांत अशोक चक्र से संमानित

49 - आखिर कौन होंगे सत्ता के इस महाभोज के सिकंदर

50 - ठेके आन फिटनेस सेंटर ऑफ छा गए केजरीवाल जी तुस्सी

हवारा के जेल तबादले का विरोध सिख विरोधी सोच

दिल्ली: जगतार सिंह हवारा को दिल्ली की जेल से पंजाब की जेल में स्थानांतरित करने की मांग का दिल्ली सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में विरोध किए जाने को शिरोमणि अकाली दल के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने गंभीर और चिंताजनक मामला बताया । 17 सितंबर 2026 को दिल्ली सरकार ने सुरक्षा का हवाला देते हुए भाई हवारा को पंजाब की जेल में भेजने का विरोध किया है, जिसकी अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भाई हवारा को पंजाब क्यों नहीं लाया जा रहा, सवाल यह भी है कि एक सिख कैदी के जेल तबादले तक को सरकार इतना बड़ा सुरक्षा मामला क्यों बना रही है? सरना ने इस रुख को उस सरकारी रवैये की अगली कड़ी बताया, जिसमें लंबे समय से बंद सिख कैदियों से जुड़े मामले कानूनी प्रक्रिया के नाम पर लंबित होते आ रहे हैं। इससे पहले प्रो. दविंदरपाल सिंह भुल्लर की समय से पहले रिहाई की अर्जी भी दिल्ली सरकार के सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा खारिज की गई थी। एक तरफ कानून और सुरक्षा के हवाले, दूसरी तरफ दशकों की कैद—आखिर इन फैसलों के पीछे सरकारी नीति क्या है, यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता।

सरना ने सिख मंत्रियों और नेताओं की चुप्पी पर भी तीखा सवाल उठाया है, जो सत्ता से बाहर रहते हुए बंदी सिंहों की रिहाई को अपना राजनीतिक फर्ज बताते रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब वोट मांगने हों तो बंदी सिंह याद आ जाते हैं, लेकिन जब सरकारी कुर्सी पर बैठकर फैसले के सामने खड़े होने का समय आता है तो वही आवाज कहां गायब हो जाती है? सिख संगत अब केवल बयान नहीं, बल्कि कार्रवाई का हिसाब मांग रही है। सरना ने सवाल किया कि जो नेता कभी सरकारों को बंदी सिंहों और नवंबर 1984 के सिख कत्लेआम के मामलों पर घेरने की बातें करते थे, वे आज सरकार का हिस्सा बनकर कितनी बार अपनी ही सरकार के पास यह मुद्दा लेकर गए हैं? क्या सत्ता की कुर्सी इतनी भारी हो गई है कि उसके नीचे बंदी सिंहों की पुकारें भी दब गई हैं? चुप्पी भी एक राजनीतिक स्थिति बन जाती है और अब संगत यह जानना चाहती है कि सिख मंत्री सरकारी फैसलों के साथ खड़े हैं या उन अधिकारों के साथ, जिनके लिए वे सत्ता से बाहर रहते हुए आवाज उठाते रहे हैं।
सरना ने सरकार से सीधे सवाल करते हुए कहा कि यदि भाई हवारा को पंजाब की जेल में स्थानांतरित करने का विरोध सुरक्षा कारणों से किया जा रहा है तो वे सुरक्षा कारण क्या हैं और उनका आधार क्या है—इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि मापदंड कानून है तो वही कानूनी मापदंड सभी मामलों में समान रूप से दिखाई देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारों को अपने फैसलों की पारदर्शी व्याख्या देनी होगी और सिख नेताओं को भी यह बताना होगा कि वे बंदी सिंहों के मामले में वास्तव में क्या कर रहे हैं। सरना ने कहा कि दशकों से जेलों में बंद सिख कैदियों के मामलों को हर बार राजनीतिक अवसर के अनुसार याद करना सिख संगत के जख्मों के साथ न्याय नहीं है। यदि सरकार के पास भाई हवारा का जेल तबादला रोकने के कारण हैं तो वे सामने आएं और यदि सिख मंत्रियों के पास सरकार से सवाल करने की ताकत है तो वे भी सामने आएं। क्योंकि अब सवाल बयान देने का नहीं, सवाल यह है कि दशकों से बंदी सिंहों के बंद दरवाजे खोलने के लिए वास्तव में कौन खड़ा होता है।

07:46 pm 18/09/2026

संपादक

डा. अशोक बड़थ्वाल

Mobile : 91-9811440461

editor@dhanustankar.com

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समाचार

1 - हवारा के जेल तबादले का विरोध सिख विरोधी सोच

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