हिन्दी-उर्दू अनुवाद विभाग उपेक्षा के शिकार, बंद होने की कगार पर
दिल्ली: एमसीडी का हिन्दी और उर्दू अनुवाद विभाग उपेक्षा का शिकार हो गया है। वर्षों से उपेक्षित ये विभाग अब बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। आलम यह है कि पिछले 17 साल से उर्दू अनुवादक की भर्ती नहीं हुई, तो हिंदी अनुवादक का भी स्थायी पद दो साल से खाली है। जबकि कभी हिन्दी और उर्दू विभाग में 31 अनुवादक हुआ करते थे, लेकिन आज भाजपा सरकार में पूरी तरह सिमट कर रह गए है। यह जानकारी साझा करते हुए आम आदमी पार्टी के नेता व एमसीडी में नेता प्रतिपक्ष अंकुश नारंग ने निगम प्रशासन से मांग की है कि तत्काल हिन्दी और उर्दू विभाग में रिक्त पदों को भरा जाए और सारे एजेंडे हिन्दी, उर्दू व अंग्रेजी में पेश किए जाएं।
निगम सचिव कार्यालय में वर्तमान में केवल एक स्थायी उर्दू अनुवादक अफहाक हुसैन कार्यरत हैं, जो दिसंबर 2026 में सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। उनके रिटायर होने के बाद उर्दू अनुवाद विभाग बंद होने की स्थिति में पहुंच जाएगा। वहीं हिंदी अनुवादक का भी स्थायी पद पिछले दो वर्षों से खाली पड़ा है। निगम सूत्रों के अनुसार वर्ष 2009 के बाद से उर्दू अनुवादक पद के लिए कोई विभागीय परीक्षा आयोजित नहीं की गई। यह दर्शाता है कि भाजपा प्रशासन राजभाषा विभाग को समाप्त करने की दिशा में काम कर रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान में जो हिंदी अनुवादक कार्यरत हैं, वे भी कॉन्ट्रैक्ट पर हैं और उन्हें नियमों के अनुरूप वेतन तक नहीं दिया जा रहा। उन्होंने कहा कि निगम सचिव कार्यालय की जिम्मेदारी होती है कि सदन की कार्यवाही और एजेंडा हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए, लेकिन आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि विभाग में आवश्यक स्टाफ तक मौजूद नहीं है।1960 के दशक में एक समय ऐसा भी था जब दिल्ली नगर निगम में हिंदी और उर्दू के 31 अनुवादक कार्यरत हुआ करते थे, लेकिन अब पूरा विभाग सिमटकर लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच चुका है। उन्होंने मांग की है कि निगम प्रशासन तुरंत स्थायी भर्ती प्रक्रिया शुरू करे और एमसीडी के एजेंडे हिंदी, उर्दू और इंग्लिश भाषा में पेश हो। साथ ही राजभाषा विभाग को मजबूती देने के लिए ठोस कदम उठाए।
07:46 pm 29/05/2026